Friday, 1 May 2015

संसद का दुरूपयोग

एक तथा कथित गांधीवादी नेता जी ने राज्यसभा में ये कह कर हंगामा खड़ा कर दिया कि पतंजलि योग पीठ की एक दवा पुत्र पैदा करने के लिए बेची जा रही है।  ये गैर कानूनी और असवैधानिक है।  उन्होंने कहा कि ये दवा हरियाणा में बेची जा रही है। उनका साथ स्वाभाविक रूप से सभी विपक्षी पार्टियों ने दिया।  हरियाणा में इसलिए क्योकि स्वामी रामदेव को हरियाणा सरकार ने अपना  ब्रांड अम्बेसडर बनाया है।  सरकार द्वारा उन्हें कैबिनेट मंत्री का दर्जा भी दिया गया था जिसे स्वामी रामदेव ने  अस्वीकार कर दिया था। इससे पहले वे पद्म विभूषण का पुरुष्कार भी अस्वीकार कर चुके हैं।  ये दो बहुत अच्छे काम हैं जो हाल में उन्होंने किये हैं।

स्वामी रामदेव ने  योग का  प्रचार प्रसार करके  लोगो में योग अपनाने की जिज्ञासा पैदा की और आज आप देश में कहीं भी जाएँ पार्कों में योग करते हुए लोग मिल जायेंगे।  बहुतायत घरों में आज योग करने वाले हैं।  लोगों में स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता ने बिना किसी औषधि के स्वस्थ्य  रहने की लालसा पैदा कर दी है।  ऐसा नहीं कि योग का बाबा रामदेव ने  आविष्कार किया है पर योग के प्रति इतना समपर्ण इससे पहले किसी ने नहीं किया। लोगो को इसका फायदा हुआ है।  मुझे इसका फायदा हुआ है। अगर निष्पक्ष रूप से देखा जाय तो समूचे हिंदुस्तान को उनका अहसान मंद होना चाहिए। ज्यादातर लोग ऐसा मानते भी हैं और ऐसा मानने वाले उनके अंध भक्त नहीं है।  ज्यादातर लोग ऐसे है जिन्होंने सिर्फ टीवी पर उनके प्रोग्राम देख कर योग करना सीखा और अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाया।  इससे देश को बीमारियों पर होने वाले खर्च में कितनी बचत हुई है इसका आंकड़ा नहीं जुटाया गया है पर हर व्यक्ति को इसका हिसाब लगाना ही चाहिए कि योग ने उसके परिवार की कितनी आर्थिक बचत की है।  शायद तभी हम सब समझ सकेंगे कि देश की कितनी बचत हुई है।  निश्चित रूप से ये धनराशि बहुत बड़ी है। जितनी बड़ी राशि है उतना ही बड़ा किसी का नुक्सान भी है।   बाबा रामदेव ने दूसरा सबसे बड़ा काम किया है आयर्वेद की दवाये बना कर और आयुर्वेद का प्रचार और प्रसार करके।  ये बताने की आवश्यकता नहीं कि आयुर्वेद की दवाये बिना किसी अतरिक्त साइड इफेक्ट के लाभ पहुँचाती हैं।  दिव्य फार्मेसी की बनी दबायें कम कीमत की हैं और इससे दूसरी कंपनियों की दवाओं के दाम भी गिरे है जो पहले बहुत महंगी हुआ करती थीं. इसका दूसरा पहलू है जडी बूटियों के उगाने और उनके प्रोसिसिंग से सामान्य जन को मिलने वाले रोजगार से।   अभी इसमें और अधिक संभावनाएं हैं जिनका दोहन किया जाना बाकी है। 

स्वामी रामदेव के इन प्रयासों ने जहाँ उन्हें सामान्य जन का हीरो बना दिया वही एक बड़ा वर्ग उनसे सख्त नाराज है जो आर्थिक रूप से प्रभावित हुए है।  इनमे द्बाइयां बनाने वाली कंपनियों से लेकर कोल्ड ड्रिंक और जंक फ़ूड बेचने वाले शामिल हैं।  कुछ लोग धार्मिक आधार पर योग के विरुद्ध है और इनके वोट बैंक के स्वयंभू ठेकेदार भी  इसी वजह से नाराज है।  ये सारा गठजोड़ हमेशा इस कोशिश में रहता है कि उन्हें कुछ मिले तो अपनी तलवार भांज  कर  इन सबकी हमदर्दी हाशिल कर लें।  कुछ को ये सुर्ख़ियों में आने का अच्छा नुस्खा लगता है।  कुछ राजनैतिक दल तो उनसे खासे नाराज रहते हैं जिनकी वजहें जग जाहिर हैं।   
दिव्य पुत्र जीवक बीज औषधि  जो सुर्ख़ियों में है, वस्तुत: infertility  की दवा है जो पुरुष और महिलाओं दोनों की दी जाती है इसकी कीमत केवल रु ३५ है।  जाहिर है अगर इसका उद्देश्य रूपया कमाना होता तो ये दबा बहुत महंगी होती।  फिरभी हो सकता कुछ दवा विक्रेता   कुछ भ्रम फैला कर बेचते हों।   पतंजलि योगपीठ की वेबसाइट पर दी गई दवाओं की लिस्ट देखने पता चलता है कि यह दवा अभी भी बेची जा रही है।  दवा के एक पैकेट की कीमत 35 रुपये है, हालांकि इस दवा पर कहीं भी ऐसा कुछ नहीं लिखा है जिससे यह कहा जा सके कि यह बेटा पैदा होने के लिए दी जाने वाली दवा है। दिव्य फार्मेंसी की साइट पर दी गई जानकारी के मुताबिक यह दवा प्रसव संबंधी समस्याओं और इन्फर्टिलिटी के लिए है। बाबा रामदेव को हरियाणा का ब्रांड एम्बेसडर बनाए जाने के बाद भी यह मुद्दा सोशल साइट्स पर चर्चा पर आया था। इस मामले में संस्थान के फाउंडर सदस्य आचार्य बाल कृष्‍ण को अपनी फेसबुक वॉल पर इस मामले में सफाई देनी पड़ी थी । बालकृष्ण ने कहा था कि विदेशी कंपनियां बाबा रामदेव की जड़ीबूटियों को बदनाम करने के लिए एक मुहिम चला रही हैं। यह जड़ी महिलाओं में बांझपन दूर करने के लिए है। खास बात यह है कि दवा का नाम पुत्र जीवक बीज नाम की इस दवा को लेकर दिव्य फार्मेसी ने ऐसा कोई दावा नहीं किया है कि इसके सेवन से पुत्र ही पैदा होगा। इससे पहले भी पतंजलि योगपीठ में ' पुत्रवती ' नामक दवा बेचने को लेकर काफी विवाद हो चुका है और 2007 में इस मामले की  जांच भी की गई थी और कुछ भी अन्यथा नहीं पाया गया था।  जाँच भी उत्तराखंड सरकार  ने की थी जो पहले भी अन्य कारणों से बाबा के पीछे पडी हुई थी। तत्कालीन केंद्र सरकार  ने तो अनेक बड़े घोटाले छोड़ कर पतंजलि पीठ की जाँच शुरू कर दी थी।  पासपोर्ट और अन्य कारणों से बालकृष्ण को गिरफ्तार कर लिया गया था।  बाबा रामदेव के उत्पाद विश्व भर में तहलका मचा रहे हैं लेकिन कुछ हिन्दुस्तानी  कुछ स्वार्थी लोगो के इशारों पर  बाबा रामदेव के नाम पर देश का बेडा गर्क कर रहें हैं. टीवी , रेडियो और समाचार पत्रों में आयी सुर्ख़ियों से उनके मंसूबे पूरे होते है, क्यों कि बड़ी कंपनिया जो तमाम पैसा खर्च कर मीडिया में जगह नहीं पा  पाती इन नेताओं पर थोडा सा उपकार कर ये काम पूरा कर लेती हैं। 

दवाई का नाम ( दिव्य पुत्र जीवक बीज) बेहद भ्रामक है और ऐसा संदेश देता है कि इससे पुत्र पैदा होगा, हालांकि दवा के पैकेट पर इस बात का दावा नहीं किया जा रहा है, दिव्या फमेसी को चाहिए कि इसका नाम बदले और अगर ऐसी और भी कोई दवा है तो उसके नाम में कोई संसय न हो।
इन तथा कथित गांधीवादी नेता ( पता नहीं सोनिया गांधीवादी या राहुल गांधीवादी ) का उद्देश्य  प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के  बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ अभियान की हवा निकालना और उन्हें घेरना है।  इन तथाकथित नेताओं ने देश का बहुत अहित किया है इनसे बहुत सावधान रहने की आवश्यकता है। 
************ 

-शिव प्रकाश मिश्र




Saturday, 25 April 2015

किसान, हम, आप और राजनीति


अभी हमने देखा और  सुना कि  दिल्ली में हुयी एक  रैली में एक किसान ने आत्म ह्त्या कर ली।  कई दिन से सारे टीवी चैनलो  पर खबर छाई  है. आज ऐसा वातावरण बना हुआ है की कोई भी अच्छी और रचनात्मक खबर समाचार पत्रो और  टीवी पर जगह नहीं पा  सकती है किन्तु असामान्य खबरे  मीडिया में   छाई  रह सकती हैं।  इसका  सीधा प्रभाव  ये होता है कि लोगों को लगता है कि कुछ ऐसा किया जाय जिस से मीडिया में जगह पा  सकें।  स्वाभाविक है  है कि इसके साइड इफेक्ट तो होंगे ही  वो अच्छे हों या बुरे।  दिल्ली में निर्भया कांड ने सभी को झकझोर दिया था  लेकिन क्या इससे पहले इतने बीभत्स कांड नहीं हुए ? बहुत हुए।  फूलन देवी के साथ हुयी घटना, जिसे ज्यादातर लोग फूलन पर बनी फिल्म के माध्यम से ही जानते हैं, कितनी दुर्दांत घटना थी।  वास्तव में इससे भी अधिक भयानक घटनाये घट चुकी हैं और आगे भी होती रहेंगी क्योकि मानवीय मूल्यों के गिरावट की कोई सीमा नहीं होती है।  जितना ख़राब से ख़राब कोई व्यक्ति सोच सकता है उतना कर भी सकता है। दिल्ली में होने के कारण निर्भया कांड को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मीडिया  में बहुत कवरेज  मिला।  महीनों टीवी, रेडियो और समाचार पत्रों में ये कांड गूंजता रहा।  हर अच्छे और बुरे व्यक्ति ने इसे अपनी अपनी तरह अपनाया । लेकिन काफी समय तक बलात्कार की क्रूरता पूर्ण घटनाओं की पूरे देश में जैसे बाढ़ आ गयी। कहते है कि बदनाम होंगे  तो भी तो नाम होगा।  कुत्सित मानसिकता के लोगों ने बेहद निम्न स्तरीय बदले की भावना  से और घ्रणित प्रचार  पाने की लालसा कितने ही अजीबोगारीब  तरीके से बलात्कार की घटनाओं को अंजाम दिया।  आज किसानो की आत्महत्या का पूरा माहौल बना है।  जितना मीडिया कवरेज मिल रहा है  उतनी ही घटनाएं सामने आ रही हैं।  मेरा ये कहने का मतलब नहीं है कि इन सबके लिए मीडिया जिम्मेदार है लेकिन असामान्य घटनाओं को सबसे पहले, सबसे निर्भीक  और सबसे तेज रिपोर्ट करने की होड़ या अंधी दौड़ ने कहीं न कहीं इन घटनाओं में उत्प्रेरण का काम किया है।

दिल्ली  की रैली में गजेन्द्र सिंह की आत्म ह्त्या भी एक कृतिम असामान्य घटना  गढ़ने की प्रक्रिया में हुआ हादसा है। अब ये छिपी बात नहीं है कि गजेन्द्र सिंह पूर्णतया  किसान नहीं थेकेवल उनका सम्बन्ध एक गाँव से था और ग्रामीण थे।   तो उनकी आर्थिक स्थिति ख़राब थी और न ही उनके पिताजी ने उन्हें घर से निकाला था. फिर उनके सुसाइड नोट में जो  संभवता उन्होंने नहीं लिखा था , ये बातें कैसे आ गयी ? किसने और  क्यों डाली   ? उनके घरवालों ने उनकी लिखावट होने से इंकार किया है.

रैली में मुख्यतया दिल्ली और आसपास के लोग थे दुसरे राज्यों से आने वालों की संख्या कम थी।  रैली का टीवी कवरेज भी बहुत नहीं था और कम से कम लाइव कवरेज तो नहीं ही था जो  कुछ नेताओं की चाहत थी।  बस फिर क्या किसी शातिर दिमाग में फितरत कौंधी और आनन् फानन में एक  किसान या किसाननुमा व्यक्ति को तलाश  कर आत्महत्या की  फुल ड्रेस ड्रामा करने की पटकथा लिखी गयी. कुछ टीवी के विडियो फुटेज में सुनायी पड़ रहा है  "सम्भल के"  "ढीला बांधना"  "पकडे रहना" "लटक गया क्या "  आदि आदि इस और इशारा कर रहा है।   बिना रिहर्शल के किये जाने वाले  ड्रामे का जो हाल होता है, वही हुआ. ये  नाटक एक गंभीर हादसे में बदल गया. जो मरने का ड्रामा कर रहा था वह सचमुच मर गया. चूंकि सबको (कम से कम कुछ लोगों  को ) पता  था कि ये नाटक है, इसलिए किसी भी ने सहायता के लिए गंभ्भीर प्रयास नहीं किया।  सब कुछ सामान्य चलता रहा  और भी भाषण भी ।  हिन्दुस्तान के सभी टीवी न्यूज चैनलों ने इस घटना का लगभग सजीव प्रसारण किया किसी भी चैनल के रिपोर्टर या कैमरा मेन ने भी अगर जरा सा मानवीय प्रयास किया होता तो   गजेन्द्र ज़िंदा होते ।  कहते है कि हर एक का अपना अपना रोल  होता है  यहाँ मानवीय सहायता का जिम्मा भी सिर्फ पुलिस को निभाना था बाकी लोगों को अपना कम करना था जैसे  नेताओं को भाषण देना , प्रेस रिपोर्टर्स को  सजीव प्रसारण करना , उपस्थिति लोगों को नेताओं और सुसाइड करने वाले की हौसला अफजाई करना आदि   कई लोगों ने मंच से चिल्ला चिल्ला कर पुलिस से किसान को बचाने की  अपील भी की और वहां उपस्थिति लोगों ने पुलिस को पहुँचने नही दिया। लोगों ने मंच से सुसाइड नोट पढ़ कर सुनाया और अपने विरोधी दलों के नेताओं को मौत का जिम्मेदार बताया उस समय तक मौत की अस्पताल से पुष्टि भी नहीं हुई थी । 

      तो क्या हुआ एक गजेन्द्र सिंह मर गए , … तो क्या हुआ उसकी बच्चे अनाथ हो गए, ………… तो क्या हुआ उनके मां बाप भाई और बहिनो के आंसू नहीं रूक रहे,  ……… वे  नहीं समझ पा रहे कि  ऐसा क्यों हुआ ?

पर बाकी सबकुछ योजना वद्ध ढंग से हुआ जैसे


  •  रैली का सजीव प्रसारण   

  • सबसे तेज, सबसे आगे और सबसे पहले  की घोषणा  .... टी आर पी  में वृद्धि

  • लगभग हर चैनल पर पैनल डिस्कसन। ……  पार्टी प्रवक्ताओं को तुरत फुरत काम

  • राजनैतिक नफा नुक्सान का आकलन शुरू। ……    
    कुछ दिनों में सब कुछ सामान्य हो जायेगा असामान्य समाचारों के शिकारी कोई और न्यूज पर टूट पड़ेंगे।  और शायद एक न्यूज अनायास उनके हाथ लग गयी  भूकंप आ रहा है नेपाल में और उत्तरी भारत  में।
                                                                        **************
        
     


 

Sunday, 30 June 2013

तार, तार-तार हुआ

                  तार हुआ बेकार
“तार आया है “  सुन कर एक बारगी दिल की धड़कने थमने लगती थी । पता नहीं क्या है अच्छा या बुरा । ज़्यादातर बुरे की आशंका से मन बेचैन हो जाता था। क्योकि समान्यतया ये ऐसी खबरों के लिए स्तेमाल होता था जिनका जल्द से जल्द दिया जाना आवश्यक होता था और ऐसी खबरें अच्छी कम ही होती हैं ।  साधारणतया इसका उपयोग जन्म, म्रत्यु, शोक और बधाई संदेशो हेतु होता था।   व्यापारिक गतविधियों मे भी इनका उपयोग होता था । इनसे दी गई सूचना को कानूनी मान्यता थी ।  इनके रेकॉर्ड को इसलिए संभाल कर रखा जाता था । बैंकों मे मुद्रा प्रेषण हेतु तार भेजे जाते थे । इसमे कोई धांधली न कर सके इसके लिए बड़ी जटिल कोड प्रक्रिया (चेक सिग्नल) अपनाई जाती थी। तार का मतलब ही था कम शब्द, कम समय (तेज गति ) मे संदेश प्रेषण और डेलीवेरी सुनिश्चित संदेह से परे । इसलिए अत्यधिक महत्वपूर्ण कार्यों के लिए ही इसका स्तेमाल होता था । कहा तो ये भी जाता है की बहुत से सरकारी कर्मचारी अपनी छुट्टी स्वीकृत कराने हेतु भी झूठे तार का सहारा लेते थे ।
आगामी 15 जुलाई 2013 से भारत संचार निगम तारों का प्रेषण बंद कर देगा और एक अत्यधिक महत्व पूर्ण और एतहासिक घटना का पटाक्षेप हो जाएगा । आइए एक निगाह डालते है टेलेग्राम के विकाश और विस्तार पर ।
  टेलिग्राफ युनानी भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ होता है दूर से लिखना। आजकल विद्युतद्वारा संदेश भेजने की इस पद्धति को तार प्रणाली तथा इस प्रकार समाचार भेजने को तार या टेलीग्राम  करना या भेजना कहते है। लगभग दो शताब्दी पूर्व वैज्ञानिकों के मस्तिष्क में यह विचार आया कि विद्युत्‌ की शक्ति से भी समाचार भेजे जा सकते हैं। सर्वप्रथम प्रयोग स्कॉटलैंड के वैज्ञानिक डा0 माडीसन से सन्‌ 1753 में इस दिशा मे किया। इसको मूर्त रूप देने में ब्रिटिश वैज्ञानिक रोनाल्ड का हाथ था, जिन्होने सन्‌ 1838 में तार द्वारा खबरें भेजने की व्यावहारिकता का प्रतिपादन सार्वजनिक रूप से किया। यद्यपि रोनाल्ड ने तार से खबरें भेजना संभव कर दिखाया, किंतु आजकल के तारयंत्र के आविष्कार का अधिकाश श्रेय अमरीकी वैज्ञानिक, सैमुएल  एफ बी मार्श को है, जिन्होने सन्‌ 1844 में वाशिंगटन और बॉल्टिमोर के बीच तार द्वारा खबरें भेजकर इसका सार्वजनिक रूप से प्रदर्शन किया। इसके ठीक 6 साल बाद ही भारत मे इसका प्रयोग  शुरू हो गया ।


                 (टेलीग्राम भेजने की पुरानी मशीन )
हिंदुस्तान मे ईस्ट इंडिया कंपनी ने पहला टेलेग्राम कोलकाता से डाइमंड हार्बर भेज कर शुरू किया । इसके बाद तो कंपनी ने भारत के सभी प्रमुख शहरों को टेलेग्राम लाइनों से जोड़ दिया । आज़ाद हिंदुस्तान मे पहले प्रधान मंत्री श्री जवाहर लाल नेहरू ने 230 शब्दो का एक टेलेग्राम ब्रिटिश प्रधान मंत्री को भेजा जिसमे कश्मीर मे पाकिस्तान के आक्रमण पर सहायता की  अपील की गई थी । हर प्रमुख शहर मे टेलेग्राम ऑफिस खोले गए थे । इसका उपयोग बढ़ाने और कीमत कम कराने के लिए कई तरीके निकाले गए उनमे सबसे मुख्य है कोडेड टेलेग्राम्स । इसमे प्रत्येक संदेश के लिए एक कोड़ होता था । जैसे “दीपावली की हार्दिक शुभकामनायें” के लिए कोड 4 । इतिहासकारों का मानना है की हिंदुस्तान मे 1857 मे अङ्ग्रेज़ी के दमनकारी शासन के खिलाफ जो सैनिक विद्रोह हुआ था उसे कुचलने मे तार की  बहुत बड़ी भूमिका थी । 
शुरू मे तार (टेलीग्राम) पोस्ट ऑफिस के साथ जुड़ा था बाद मे इसे टेलीफोन को दे दिया गया जो स्वाभाविक रूप से भारत संचार निगम के उत्तराधिकार मे आ गया। इसके बंद करने का फैसला अचानक नहीं हुआ । तार की बढ़ती कीमत और मांग की कमी इसके बंद होने का एकमात्र कारण रहा होगा । तकनीक  के इस दौर मे जहां मोबाइल टेलीफोनी की क्रांति ने घर घर मे मोबाइल की पहुंच बना दी है वहीं सस्ते एसएमएस और कुछ हद तक मुफ्त एसएमएस ने रही सही कसर पूरी कर दी। व्यापारिक स्तर  पर भी देखे तो बैंको के कोर बैंकिंग मे आने के बाद थोक मे कोई ग्राहक नही बचे थे । पुलिस और वकील अभी इनका उपयोग कर रहे थे क्यो की न्यायालयों मे साक्ष्य के रूप मे इनकी मान्यता थी ।
जब भी कोई नई, सस्ती और सुगम  टेक्नालजी आती है तो ये सर्व स्वीकार्य होती है और इसलिए पुरानी टेक्नालजी का स्थान बड़े आसानी से ले लेती है। यही मोबाइल टेलेफोनी ने टेलीग्राम के साथ किया। जब  आर्थिक रूप टेलेग्राम को चलाते रहना घाटे का सौदा हो गया तो इसे आज नहीं तो कल बंद  होना ही था । किन्तु इतिहास मे तार हमेशा हमेशा के लिए अमर रहेगा और सदियों बाद आने वाली पीढ़ी के लिए किस्से कहानियों के कौतूहल से कम नही होगा।
 
                                                            शिव प्रकाश मिश्रा